उबदी चित्र दीर्घा दिक्चालन सूचीउबदी[update]21°53′58″N 75°31′27″E / 21.89944°N 75.52417°E / 21.89944; 75.52417

मध्य प्रदेश के गाँव


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उबदी
—  भारत के गांव  —



Map of मध्यप्रदेश with उबदी marked

Location of उबदी


 उबदी 





समय मंडल: आईएसटी (यूटीसी+५:३०)

देश

Flag of India.svg भारत

राज्य

मध्यप्रदेश

ज़िला

खरगोन

तहसील

खरगोन

जनसंख्या
लगभग 1700 (2011 के अनुसार [update])


निर्देशांक: 21°53′58″N 75°31′27″E / 21.89944°N 75.52417°E / 21.89944; 75.52417


उबदी म.प्र. के खरगोन जिला मुख्यालय से पश्चिम में १५ किमी दूर ठीकरी मार्ग पर स्थित १७०० की आबादी और लगभग ३७० परिवारों का गाँव है। यह गांव लेवा पाटीदार समाज के ६२ गाँवो में से एक पाटीदार बहुल गाँव है। यहां पर १३०(घोषित) पाटीदार परिवार निवास करते हैं। इनके अलावा राजपूत,भील हरिजन आदि भी यहाँ निवासरत है। यहां अधिकतर लोगों का व्यवसाय किसानी है। गांव शिवजी के डमरू के आकार का बसा हुआ है।




उबदी गाँव की एक गली


इतिहास - गाँव का इतिहास बहुत पुराना है। लगभग 250 वर्षों पूर्व गाँव को बसाया गया था। पहले गाँव में राजव्यवस्था का चलन था। तत्पश्चात उबदी को समीप के गांव नन्दगाँव की पंचायत में सम्मिलित किया गया। कालान्तर में सन् 1985 में यहाँ पहली बार चुनाव हुये। पहली बार हुए चुनाव में तीन गांव अकावल्या,अघावन और उबदी में सामुहिक रूप से सम्मिलित थे। इस चुनाव में सरपंच उबदी के प्रत्याशी नहार सिंह चौहान को चुना गया।




दक्षिण दिशा से गांव का दृश्य


मानचित्र - गाँव मुख्यतः खरगोन से पश्चिम में बिल्कुल एक रेखा में बसा है। इसके पूर्व में राज्यमंत्री बालकृष्ण पाटीदार का गांव टेमला, पश्चिम में नन्दगाँव, उत्तर में अकावल्या उत्तर-पूर्व में अघावन और पंधानिया,दक्षिण-पश्चिम में पीपरी और इच्छापुर आदि गांव स्थित है। गांव में लगभग 250 वर्ष प्राचीन रामजी मन्दिर है, जिसके निर्माण के बारे में वर्तमान के निवासियों को कोई जानकारी नहीं है। इसके साथ ही गांव में हनुमानजी,गायत्री माँ,कालिका माँ के मंदिर है। अघावन मार्ग पर एक छोटा सा सरस्वती माता का मंदिर भी है। यह मंदिर अघावन पढ़ने जाने वाले विद्यार्थियों द्वारा ९० के दशक में बनाया गया था। गांव में प्रत्येक समाज की अपनी अलग धर्मशाला भी है,किन्तु यदि बड़ा समारोह समारोह सम्पन्न करना होता है तो अक्सर पाटीदार समाज की धर्मशाला को उपयोग में लाया जाता है। इसके साथ ही यह सम्पूर्ण गाँव हरियाली से परिपूर्ण है। पूर्व की ओर से गांव में प्रवेश करने पर सारा गांव जंगल मे बसा हुआ प्रतीत होता है। वृक्षारोपण के क्षेत्र में भी यह गांव बहुत आगे है।


उपलब्धि - पानी व बिजली बचाने में गाँव पुरस्कृत हो चुका है। लगभग 85% घरों में गोबर गैस संयंत्र स्थापित है। संघ परिवार का विद्यालय सरस्वती शिशु मंदिर भी संचालित है। गाँव में अनेक प्रबुद्ध,संगठनों के पदाधिकारी व शास. सेवक निवास करते हैं। गांव का युवा वर्ग गांव को अपने हाथों में ले चुका है। गांव के किसी भी कार्यक्रम की कल्पना युवाओं की सहायता बगैर की ही नहीं जा सकती है। यहां के युवा शिक्षा के क्षेत्र में भी अपना परचम लहरा रहे हैं। भले ही कुछ युवा इंटरमीडिएट तक की पढ़ाई भी न कर पाए हो, किन्तु वे भी गांव के सामाजिक कार्यों में हाथ बंटाना अपना निजी कर्तव्य समझते हैं। यह गांव स्वच्छ भारत अभियान के तहत खुले में शौच मुक्त गांव भी घोषित है। जर्मनी और स्विट्जरलैंड के शोधार्थी भी इस गांव पर अध्ययन करने के लिए यहां पहुंच चुके हैं। गांव के सभी समुदायों के लोग आपस में मिल-जुल कर रहते हैं। यहां तक की तथाकथित दलित लोगों को भी मंदिरों में आने की अनुमति प्राप्त है। उनके साथ किसी भी प्रकार का भेदभाव नहीं किया जाता है। सवर्ण जाति के वैवाहिक कार्यक्रमों में उन्हें भी भोजन के लिए आमंत्रित किया जाता है। गांव के समस्त काम यहां के लोग मिलकर करते हैं। हालांकि कुछ लोगों की घटिया राजनीति ने गांव को अंधेरे में धकेलने की बहुत कोशिश की किंतु कहा जाता है न कि "रात कितनी भी लंबी हो सूर्य के प्रकाश के सामने नहीं टिक सकती।" बस यही कहावत इस गांव पर लागू हुई है और आज गांव बुलंदियों के नए आयाम लिख रहा है।


उपहास - गाँव में राजनीति ने जड़ें जमाई है। कुछ समाजसेवी सेवा के नाम पर लोगो को पथभ्रष्ट कर रहे हैं। यद्यपि गांव स्वच्छता के बारे में अनेक पुरस्कार प्राप्त कर चुका है, परंतु फिर भी कुछ लोग आज भी स्वच्छता के बारे में जागरूक नहीं है। कुछ या तो सरकार को इसके बारे में दोष देते हैं या कुछ स्वयं इसके पक्ष में नहीं है। राजनीति गांव को दीमक की तरह खाती हुई जा रही है। पूर्व के अनेक सरपंचों पर भ्रष्टाचारिता की मुहर लगी हुई है। यद्यपि यह तो पूरी तरह सत्य है कि कोई भी नेता अपने परिवार का, अपने रिश्तेदारों का और अपना खुद का भला किए बगैर राजनीति कर ही नहीं सकता, फिर भी वर्तमान सरपंच ने ऐसा नहीं किया है। वह अपने एक हाथ से अपंग है फिर भी गांव की नालियां और गांव का कचरा साफ करने में उन्हें फक्र महसूस होता है। गांव के कुछ व्यक्ति खुद को समाजसेवी कहते हैं और अभी तक अपने ही घर को नहीं सुधार पाए हैं, ऐसे में गांव या समाज को सुधारना पानी पर लकीर खींचने के समान प्रतीत होता है। राजनीति ने अरसे से एक रह रहे पाटीदार समाज को आपसी द्वंद्व में धकेला है। हालांकि अब लोग इन गन्दे गड्ढे से बाहर निकलने लगे है, फिर भी गांव को पूरी तरह पवित्र बनने में अभी भी समय लगेगा।



चित्र दीर्घा



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